Shiv Tandav Stotram Lyrics: Complete Sanskrit Text, Hindi Meaning & Benefits श्रीशिवताण्डवस्तोत्रम् रावणरचितम्

Shiv Tandav Stotram Lyrics in Hindi पढ़ें। रावण रचित सम्पूर्ण स्तोत्र, हिन्दी अर्थ, पाठ के लाभ, महत्व, सही उच्चारण और आध्यात्मिक जानकारी एक ही जगह।

Jun 15, 2026 - 10:20
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Shiv Tandav Stotram Lyrics: Complete Sanskrit Text, Hindi Meaning & Benefits श्रीशिवताण्डवस्तोत्रम् रावणरचितम्
॥ अथ रावणकृतशिवताण्डवस्तोत्रम् ॥

  ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
  गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
  चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥ १॥

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
  विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
  किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥ २॥

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
  स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
  क्वचिद्दिगम्बरे(क्वचिच्चिदम्बरे) मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥ ३॥

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
  कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे (सिन्धुरासुरत्व)
  मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥ ४॥

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
  प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः
  श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥ ५॥ (श्रिये)

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
  निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् । (स्फुलिङ्गया निपीत)
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
  महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः  ॥ ६॥ 
(महः कपालि सम्पदे सरिज्जटालमस्तु नः ॥)

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
  द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
  प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥ ७॥

नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्-
  कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः । (प्रबद्धबद्ध)
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
  कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥ ८॥

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
  ऽवलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
  गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥ ९॥

अखर्व(अगर्व)सर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी-
  रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम् ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
  गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥ १०॥

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस- (जयत्यद)
  द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल- (धिमिं धिमिं धिमिं ध्वनन्)
  ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥ ११॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्-
  गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
  समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥ १२॥ 
  (समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥)

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
  विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् ।
विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः
(विमुक्तलोललोचनाललामभाललग्नकं)
  शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥ १३॥

निलिम्पनाथनागरीकदम्बमौलमल्लिका-
  निगुम्फनिर्भरक्षरन्मधूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीमहर्निशं
  परश्रियः परं पदं तदङ्गजत्विषां चयः ॥ १४॥

प्रचण्डवाडवानलप्रभाशुभप्रचारणी
  महाष्टसिद्धिकामिनीजनाऽवहूतजल्पना ।
विमुक्तवामलोचनाविवाहकालिकध्वनिः
  शिवेति मन्त्रभूषणा जगज्जयाय जायताम् ॥ १५॥

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
  पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसन्ततम् ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नाऽन्यथा गतिं
  विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥ १६॥

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
  यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
  लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥ १७॥ 
(लक्ष्मीं प्रसादसमये प्रददाति शम्भुः)

  ॥ इति श्रीरावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥



॥ श्री रावणकृत शिव ताण्डव स्तोत्र – हिन्दी भावानुवाद ॥

श्लोक 1 – भावार्थ

भगवान शिव की विशाल जटाओं से बहती हुई गंगाजी की पवित्र धारा सम्पूर्ण जगत को पावन कर रही है। उनके गले में विशाल सर्पों की मालाएँ शोभायमान हैं और उनके डमरू की गूँज से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड नृत्यमय हो उठता है। ऐसे कल्याणकारी शिव हम सबका मंगल करें।

श्लोक 2 – भावार्थ

भगवान शिव की जटाओं में स्वर्ग की गंगा अपनी लहरों के साथ शोभायमान है। उनके ललाट की प्रचण्ड अग्नि निरन्तर प्रज्वलित रहती है और उनके मस्तक पर सुशोभित अर्धचन्द्र उनकी दिव्यता को और बढ़ाता है। मेरा मन हर क्षण ऐसे शिव में अनुरक्त रहे।

श्लोक 3 – भावार्थ

जिनके मन में पार्वती जी के साथ दिव्य प्रेम और आनंद का निवास है तथा जिनकी कृपादृष्टि भक्तों के बड़े से बड़े संकटों को समाप्त कर देती है, ऐसे दिगम्बर भगवान शिव में मेरा मन सदैव आनन्द प्राप्त करे।

श्लोक 4 – भावार्थ

भगवान शिव के गले में लिपटे सर्पों के फणों की मणियों की आभा और कुमकुम से सुशोभित दिशाएँ अत्यन्त मनोहर हैं। हाथी की खाल धारण करने वाले समस्त प्राणियों के पालनहार शिव मेरे मन को अद्भुत आनन्द प्रदान करें।

श्लोक 5 – भावार्थ

देवताओं के मुकुटों से गिरने वाले पुष्पों की धूल जिनके चरणों की शोभा बढ़ाती है और जिनकी जटाओं में सर्पराज सुशोभित हैं, मस्तक पर चन्द्र धारण करने वाले वे भगवान शिव हमें स्थायी समृद्धि प्रदान करें।

श्लोक 6 – भावार्थ

भगवान शिव के ललाट की अग्नि ने कामदेव को भस्म कर दिया। उनके मस्तक पर अमृतमयी चन्द्रकला शोभायमान है। ऐसे महाकपालधारी शिव की जटाएँ हमारे जीवन में सौभाग्य और कल्याण का कारण बनें।

श्लोक 7 – भावार्थ

प्रचण्ड अग्नि से युक्त उनके भाल ने कामदेव का दहन कर दिया। पार्वती जी के सौन्दर्य का अलौकिक श्रृंगार करने वाले त्रिनेत्रधारी भगवान शिव में मेरी अटूट प्रीति बनी रहे।

श्लोक 8 – भावार्थ

घने मेघों के समान गम्भीर स्वरूप वाले, गंगाधर, हाथी की खाल धारण करने वाले तथा सम्पूर्ण कलाओं के भण्डार भगवान शिव सम्पूर्ण संसार को ऐश्वर्य और कल्याण प्रदान करें।

श्लोक 9 – भावार्थ

मैं उन भगवान शिव की उपासना करता हूँ जिन्होंने कामदेव, त्रिपुरासुर, संसार के बन्धनों, यज्ञ के अभिमान, गजासुर, अन्धकासुर और स्वयं मृत्यु के भय तक का नाश कर दिया।

श्लोक 10 – भावार्थ

मैं उन परम मंगलमय भगवान शिव का स्मरण करता हूँ जो समस्त शुभ कलाओं के स्रोत हैं, जिनकी कृपा अमृत के समान मधुर है और जिन्होंने काम, त्रिपुर, संसार, यज्ञ, गजासुर, अन्धक तथा मृत्यु के अहंकार का विनाश किया।

श्लोक 11 – भावार्थ

भगवान शिव के प्रचण्ड ताण्डव के समय सर्पों की गति, ललाट की अग्नि और मृदंग की दिव्य ध्वनि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अद्भुत शक्ति और मंगल का संचार करती है। उस महाताण्डव की सदैव विजय हो।

श्लोक 12 – भावार्थ

कब मेरा मन ऐसी समदृष्टि प्राप्त करेगा कि पत्थर और रत्न, मित्र और शत्रु, तिनका और कमल, साधारण व्यक्ति और राजा—सभी मुझे समान दिखाई दें और मैं सदैव भगवान सदाशिव का भजन कर सकूँ।

श्लोक 13 – भावार्थ

कब मैं गंगाजी के तट पर एकान्त में निवास करूँगा, समस्त विकारों से मुक्त होकर हाथ जोड़कर निरन्तर "शिव-शिव" का जप करूँगा और परम आनन्द को प्राप्त करूँगा।

श्लोक 14 – भावार्थ

देवांगनाओं के पुष्पों की सुगन्ध से सुशोभित भगवान शिव का तेज दिन-रात हमारे मन को आनन्द से भर दे और हमें परम दिव्य पद की प्राप्ति कराए।

श्लोक 15 – भावार्थ

भगवान शिव का "शिव" नाम ही महान शक्ति का स्रोत है। यह समस्त सिद्धियों को प्रदान करने वाला, मंगलकारी तथा सम्पूर्ण जगत को विजय और कल्याण देने वाला दिव्य मंत्र है।

श्लोक 16 – भावार्थ

जो मनुष्य इस श्रेष्ठ स्तोत्र का नित्य पाठ, स्मरण और उच्चारण करता है, वह मन, वचन और कर्म से शुद्ध हो जाता है तथा भगवान शंकर और गुरु के प्रति शीघ्र ही अटूट भक्ति प्राप्त करता है। शिव का चिन्तन समस्त मोह का नाश कर देता है।

श्लोक 17 – फलश्रुति (पाठ का फल)

जो व्यक्ति भगवान शम्भु की पूजा के अंत में, विशेषकर प्रदोष काल में, श्रद्धापूर्वक इस शिव ताण्डव स्तोत्र का पाठ करता है, उस पर भगवान शिव सदैव प्रसन्न रहते हैं और उसे स्थायी लक्ष्मी, वैभव, सुख, रथ, गज, अश्व तथा समस्त शुभ सम्पत्तियों का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

संक्षिप्त सार

शिव ताण्डव स्तोत्र केवल भगवान शिव की स्तुति नहीं, बल्कि उनकी अनन्त शक्ति, वैराग्य, करुणा, संहार और सृष्टि-चक्र का अद्भुत काव्यात्मक वर्णन है। इसका श्रद्धापूर्वक पाठ मन को स्थिरता, आत्मबल, सकारात्मक ऊर्जा और भगवान शिव की कृपा का अनुभव कराता है।

हर हर महादेव। 🔱🙏




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